Women Reservation Bill
भारत में Women Reservation Bill फिर से सियासत के केंद्र में है। सरकार इसे महिला सशक्तिकरण का ऐतिहासिक कदम बता रही है, जबकि विपक्ष सवाल उठा रहा है कि क्या यह सिर्फ महिलाओं के हक का मुद्दा है या इसके पीछे राजनीतिक ताकत का नया गणित छिपा है।
लोकसभा सीटों के विस्तार से लेकर परिसीमन तक, तीन बड़े विधेयकों ने देश की राजनीति में हलचल मचा दी है। अब बहस सिर्फ महिला आरक्षण की नहीं रही, बल्कि यह सवाल बनने लगा है—क्या भारत का राजनीतिक नक्शा ही बदलने वाला है?
केंद्र सरकार ने लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखा है। इनमें से 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
प्रस्ताव के मुताबिक 815 सीटें राज्यों को और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों को मिलने की बात कही गई है।
सरकार का तर्क है कि बढ़ती आबादी और महिलाओं की कम भागीदारी को देखते हुए यह कदम जरूरी है। लेकिन विपक्ष इस फैसले को चुनावी रणनीति और शक्ति संतुलन बदलने की कोशिश मान रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब जनगणना के अंतिम नतीजे आए ही नहीं, तब परिसीमन की प्रक्रिया क्यों शुरू की जा रही है?
जनगणना 2021 में होनी थी, लेकिन इसमें पांच साल की देरी हुई। इसके नतीजे 2027 में आने की उम्मीद है। इसके बावजूद सरकार 2026 में ही परिसीमन और लोकसभा विस्तार की दिशा में आगे बढ़ रही है।
विपक्ष इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ बता रहा है।
सरकार ने संसद के एक विशेष सत्र में तीन बड़े विधेयक पेश किए हैं—
संविधान संशोधन के लिए दोनों सदनों में दो‑तिहाई बहुमत जरूरी है, इसलिए सरकार विपक्ष का समर्थन चाहती है। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि विधेयक जल्दबाजी में लाए गए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ये विधेयक पारित हो जाते हैं, तो लोकसभा का वर्तमान संतुलन पूरी तरह बदल सकता है।
जनसंख्या के आधार पर उत्तरी राज्यों को अधिक सीटें मिलने की संभावना है।
इसका मतलब है—
जैसे राज्यों की राजनीतिक ताकत और बढ़ेगी। वहीं दक्षिणी राज्यों का प्रभाव घट सकता है।
दक्षिणी राज्यों ने दशकों पहले जनसंख्या नियंत्रण नीति को गंभीरता से अपनाया। इसी वजह से 1971 की जनगणना को परिसीमन का आधार बनाया गया था, ताकि जिम्मेदारी निभाने वाले राज्यों को नुकसान न हो।
अब अगर यह रोक हटती है, तो—
यही वजह है कि तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्य खुलकर विरोध कर रहे हैं।
विपक्ष का कहना है कि Women Reservation Bill का विरोध नहीं है, बल्कि इसे लागू करने के तरीके पर आपत्ति है।
2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम में महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़ा गया था।
अब सरकार उसी शर्त को बदलती नजर आ रही है।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल सवाल कर रहे हैं—
अगर महिलाओं को आरक्षण देना है, तो पहले लोकसभा सीटें बढ़ाने की जरूरत क्यों?
आलोचकों का मानना है कि—
कुछ लोग यह भी सवाल उठा रहे हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं कि सीटें बढ़ाकर मौजूदा सांसदों को भरोसा दिया जा रहा हो कि उनकी सीट खतरे में नहीं है।
Women Reservation Bill भारतीय राजनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है।
लेकिन असली बहस महिला आरक्षण से ज्यादा परिसीमन, प्रतिनिधित्व और केंद्र‑राज्य संतुलन को लेकर है।
आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि यह फैसला—
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About the author
Sudipta Sahoo is a Content Writer at Ichchekutum Hindi, specializing in coverage of celebrations, government schemes, technology, and automobile news. He is known for his clear writing style, curiosity driven research, and a strong reader first approach in every article.
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